Description
माँ शारदे की असीम अनुकम्पा से मैं अपनी छंदोबद्ध रचनाओं का संकलन “काव्य रसधार” पुस्तक के रूप में आपके समक्ष ला सकी हूँ अतःउनके चरणों में मेरा शत शत वंदन है। साहित्य के क्षेत्र में काव्य विधा अपनी एक अलग पहचान रखती है।कवि अपनी भावनाओं को छंद,लय,तुक और आलंकारिक भाषा का प्रयोग कर कविता को गति प्रदान करता है,उसे सुरुचिपूर्ण और सरस बना देता है।जो बातें गद्य में विस्तार से कही जाती हैं वह संक्षिप्त शब्दों में कविता में उभर आती है। मेरी रूचि कविता के प्रति विद्यार्थी जीवन से ही थी ,लिखती तो थी पर छंद का ज्ञान नहीं था। जब मैं अभ्युदय अंतराष्ट्रीय संस्था में सम्मिलित हुई जिसकी संस्थापिका इंदु झुनझुनवाला जी हैं तो मुझे कई रचनाकारों की कविताओं को पढ़ने का अवसर मिला।साथ ही संस्था की गुरुकुल शाखा ने मेरी छंद ज्ञान की लालसा को तीव्र कर दिया,मेरी चाहत को आधार मिल गया,मैं गुरुकुल से जुड़ गई। मेरे भाव चंद पंक्तियों में— छंद का मैं ज्ञान पाऊँ कामना मेरी यही, काव्य को श्रृंगार दूँ मैं सर्जना भी हो सही। है अधूरी जानकारी साधना पूरी करूँ, सीख लूँ मैं भी विधा को भाव शब्दों में भरूँ। मैं इंदु जी(संस्थापिका) की अत्यंत आभारी हूँ जिनकी संस्था ने मेरी काव्य प्रतिभा को जिससे मैं अनजान थी,उसे बाहर लाया और गुरुकुल ने उसे सँवारा निखारा। अपने गुरुजनों चंदा प्रहलादका जी,पुरुषोत्तम चौधरी जी तथा ममता मावंडिया जी के प्रति कृतज्ञ हूँ जिन्होंने बड़े मनोयोग से मुझे छंद के विधि विधान से अवगत कराया।उनके मार्गदर्शन से ही मैं अपनी रचनाओं को निखार पाई।आज भी मैं अभ्यास रत हूँ तथा नए रचनाकारों से यही कहना चाहूँगी — अपनी रचना को हम सतत निखारें, भूल हुई जो हमसे उसे सुधारें। संशय दूर करें हम सृजन सँवारें, निर्देशन गुरु का हो शब्द विचारें। गुरुकुल आकर बढ़ता ज्ञान हमारा, मति,विवेक,प्रज्ञा ही एक सहारा। सही दिशा में गुरुवर राह दिखाते, उनके आश्रय में हम कदम बढ़ाते। गुरुजनों के प्रति ये मेरे समर्पित भाव हैं। मेरी कोशिश रही है कि कविताएँ सारयुक्त,सुगम्य व सुरुचिपूर्ण हो,प्रेरणादायी हों तथा समयानुकूल हों ताकि पाठकगण रूचि लेकर पढ़ सकें। मानव जीवन के विविध पहलुओं को अपने भावों द्वारा सुसज्जित कर विभिन्न छंदों में पिरोने का प्रयास किया है। आशा करती हूँ सभी सुधि पाठकों को मेरा यह प्रयास पसंद आएगा और तभी मेरी रचना सार्थक भी हो पाएगी। छंद के विधान देखती हजार, प्रयास है लिखूँ सुरुचि काव्य हो। एकनिष्ठ ध्यान से रही सँवार, विचार जो रखूँ सुरम्य भव्य हो। समस्त पाठकों का तहेदिल आभार व धन्यवाद







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