Phir Bhi (फिर भी): Something That Remains Amid Uncertainty

₹399.00


Back Cover

“फिर भी” आत्मचिंतन और दार्शनिक गद्य-निबंधों का एक ऐसा संग्रह है, जो मनुष्य के भीतर उठती उन सूक्ष्म हलचलों को देखने की कोशिश करता है, जिन्हें किसी एक नाम या निष्कर्ष में बाँधना कठिन है।
यह किताब पूछती है—
हम जो मानते हैं, वह हम क्यों मानते हैं?
जिसे हम अपना “मैं” कहते हैं, वह कितना स्थिर है?
क्या हर इच्छा के पीछे सचमुच कोई आवश्यकता होती है?

Description

“फिर भी” आत्मचिंतन और दार्शनिक गद्य-निबंधों का एक ऐसा संग्रह है, जो मनुष्य के भीतर उठती उन सूक्ष्म हलचलों को देखने की कोशिश करता है, जिन्हें किसी एक नाम या निष्कर्ष में बाँधना कठिन है।
यह किताब पूछती है—
हम जो मानते हैं, वह हम क्यों मानते हैं?
जिसे हम अपना “मैं” कहते हैं, वह कितना स्थिर है?
क्या हर इच्छा के पीछे सचमुच कोई आवश्यकता होती है?
क्या हर उत्तर हमें शांत करता है?
और क्या जीवन को समझने के लिए
हर बार उसका अर्थ जानना ज़रूरी है?
इन पन्नों में बाहरी दुनिया केवल एक आरंभ है—
एक दृश्य, एक रात, एक साधारण घटना,
एक चलता हुआ दिन,
या मन में अचानक उठता कोई विचार।
वहीं से यात्रा
धीरे-धीरे बाहर से भीतर की ओर मुड़ती है।
कहीं प्रश्न
उत्तर से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
कहीं ठहरना
आगे बढ़ने का एक और रूप बन जाता है।
कहीं “होने” के लिए
किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रह जाती।
और शायद इसी कारण—
इस किताब का सबसे छोटा वाक्य
उसका सबसे बड़ा अर्थ बन जाता है।
फिर भी।

Book Details

Available Format

Paperback

ISBN

9789374266939

Language

Hindi

Page Count

196

Published Year

2026

Size

5×8 in

Author

शाहनवाज़ चौधरी

Publisher

OrangeBooks Publication

Reviews

Reviews

There are no reviews yet.

Be the first to review “Phir Bhi (फिर भी): Something That Remains Amid Uncertainty”